Hariyali Teej 2022: कब है हरियाली तीज, जानिए तिथि, महत्व और क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज

Hariyali Teej 2022 Date | Hariyali Teej Kab Hai 2022: साल 2022 में हरियाली तीज का पर्व 31 जुलाई 2022, रविवार को है। सावन का महीना सनातन हिंदू धर्म के लिए बेहद पवित्र है। इसी महीने से अगले चार महीने तक कई तीज पर्व शुरू हो जाते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि सावन का महीना शिव शंकर को बहुत प्रिय होता है। इसलिए इस महीने आने वाले ज्यादातर त्योहार शिव पार्वती की पूजा से जुड़े होते हैं। इस पूरे महीने शिव की पूजा की जाती है और शिव और पार्वती के अटूट संबंध को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

हरियाली तीज सावन के महीने के विभिन्न त्योहारों में से एक है। विवाहित महिलाओं के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शिव पार्वती से जुड़ा हुआ है। हरियाली तीज को तीजन (Teejan) के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार ज्यादातर जुलाई-अगस्त में पड़ता है और इस समय हमारे देश में मानसून का मौसम होता है। जिससे चारों तरफ हरियाली होती है। ऐसा लगता है कि किसी ने प्रकृति को हरी चादर से ढक दिया हो। हमारे देश में तीज का महत्व करवा चौथ के व्रत के समान ही है।

सावन के महीने की पहली अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। जो जुलाई और अगस्त के बीच आती है। हरियाली अमावस्या को हरियाली अमावस और हरियाली अमास के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में उत्साह के साथ मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में हरियाली अमावस्या असाढ़ महीने की अमावास में मनाई जाती है। कर्नाटक में इसे भीमाना अमावस्या (Bheemana amavasya) कहा जाता है। महाराष्ट्र में इसे गतारी अमावस्या (Gatari amavasya) कहा जाता है, केरल में इसे कर्किदाका वावू बाली (Karkidaka vavu bali) कहा जाता है और उड़ीसा में इसे चितालागी अमावस्या (Chitalagi amavas) कहा जाता है।

हरियाली तीज सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व नागपंचमी पर्व से 2 दिन पहले आता है। हरियाली तीज से तीन दिन पहले शुक्ल अमावस्या को हरियाली अमावस्या मनाई जाती है।

साल 2022 में हरियाली तीज का पर्व 31 जुलाई 2022 यानी रविवार के दिन है।

हरियाली तीज 2022 तिथि (Hariyali Teej 2022 Date): 31 जुलाई 2022, रविवार

हरियाली तीज का महत्व (Significance of Hariyali Teej)

सनातन धर्म में साल भर में चार तीज मनाई जाती है। हर तीज का अपना अलग महत्व होता है और सभी तीज को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए तीज का महत्व बहुत ही ज्यादा होता है। हरियाली तीज को श्रावणी तीज और सिंधारा तीज के नाम से भी जाना जाता है। भारत में अलग-अलग प्रांतों के लोग इसे अलग-अलग नामों से जानते हैं। लेकिन इस व्रत का मकसद सभी के लिए एक ही है पति की लंबी उम्र। इस व्रत का एक और उद्देश्य है, बहुत अधिक गर्मी के बाद, जब बारिश आती है, चारों ओर हरियाली होती है, लोग इस हरियाली और पृथ्वी के नएपन को तीज के रूप में मनाते हैं। ताकि हमारे देश में कृषि अच्छी तरह से हो सके। हरियाली तीज का व्रत कर लोग भगवान से अच्छी वर्षा की कामना करते हैं। महिलाएं अपने परिवार, पति के लिए प्रार्थना करती हैं। लड़कियां अच्छे पति की कामना करती हैं।

क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज | Why is Hariyali Teej celebrated

पौराणिक हिंदू मान्यता के अनुसार तीज का व्रत के द्वारा ही माता पार्वती शिव को प्रसन्न कर पाई थी। इस दिन शिव ने पार्वती को पूर्ण रूप से अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। माता पार्वती के लिए शिव को प्रसन्न करना इतना आसान नहीं था। हम सभी जानते हैं कि कैसे माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। बहुत कठिन तपस्या के बाद, शिव ने पार्वती से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

कैसे मनाते है हरियाली तीज (How to celebrate Hariyali Teej)

हरियाली तीज से एक दिन पहले महिलाएं सिंधारे मनाती हैं। नवविवाहित लड़कियों के लिए यह बेहद खास होता है। नई दुल्हन को अपनी पहली सिंधारा हमेशा याद रहती है। इस दिन सास अपनी नई बहू को सोलह श्रृंगार का सामान भेंट करती हैं। जिसमें मेहंदी, सिंदूर, आलता, चूड़ी, बिंदी, पारंपरिक कपड़े, सोने के आभूषण आदि शामिल हैं। श्रृंगार का सामान एक सुहागन के लिए सुहाग का प्रतीक होता है। एक लोककथा है कि अगर विवाहित महिला पूरे 16 श्रृंगार का सामान पहनती है, तो पति को लंबी उम्र मिलती है। शादी के बाद महिलाएं अपने मायके में पहली हरियाली तीज मनाती हैं।

हरियाली तीज कथा | Hariyali Teej Katha

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने हिमालयराज के घर में पुनर्जन्म लिया था। उन्होंने बचपन से ही शिव को पति के रूप में पाने की कामना की थी। समय बीतने के साथ, एक दिन नारद मुनि राजा हिमालय से मिलने गए और वहां उन्होंने माता पार्वती से विवाह के लिए भगवान विष्णु का नाम सुझाया। यह बात हिमालयराज को भी पसंद आई। वह विष्णु को अपने दामाद के रूप में स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए ।

जब माता पार्वती को पता चला कि उनका विवाह विष्णु के साथ तय हो गया है, तो वे बहुत निराश हुईं। भगवान शिव को पाने के लिए वह एक सुनसान जंगल में गईं। जहां उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर व्रत किया। शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने घोर तपस्या की।

माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें उनकी मनोकामना पूर्ण करने का वरदान दिया। दूसरी ओर, जब पर्वत राजा हिमालय को माता पार्वती के मन की बात पता चली, तो वह भगवान शिव के साथ देवी पार्वती के विवाह के लिए सहमत हो गए। आखिरकार माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ और तभी से इस दिन को हरियाली तीज के रूप में मनाया जाता है।

सोलह श्रृंगार का महत्व

हरी चूड़ियां, हरे वस्त्र धारण करने, सोलह श्रृंगार करने और मेहंदी रचाने का हरियाली तीज में विशेष महत्व है। इस त्योहार पर नवविवाहित लड़कियों को उनके ससुराल में शादी के बाद पहला सावन आने पर पीहर बुलाया जाता है। लोकमान्य परंपरा के अनुसार, इस त्योहार पर नवविवाहित लड़की के ससुराल से सिंजारा भेजा जाता है। जिसमें कपड़े, आभूषण, श्रृंगार की वस्तुएं, मेहंदी, घेवर-फैनी और मिठाई आदि भेजी जाती हैं। इस दिन महिलाएं मिट्टी या बालू से मां पार्वती और शिवलिंग बनाकर पूजा करती हैं। पूजा में सुहाग की सभी सामग्री को एक थाली में एकत्र कर सजाकर देवी पार्वती को अर्पित करना चाहिए। नैवेद में खीर पुरी या हलुआ और मालपुआ चढ़ाकर भगवान को प्रसन्न करें। तत्पश्चात भगवान शिव को वस्त्र अर्पित कर तीज माता की कथा सुनना या पढ़ना चाहिए। पूजा के बाद इन मूर्तियों को नदी या किसी पवित्र जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव और देवी पार्वती ने इस तिथि को विवाहित महिलाओं के लिए सौभाग्य का दिन होने का आशीर्वाद दिया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन विवाहित महिलाएं जो सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं। उन्हें सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

हरियाली तीज परंपरा

हरियाली तीज की विभिन्न परंपराओं को हमारे द्वारा नीचे दिए गए लेख में प्रदर्शित किया गया है –

मेहंदी

मेहंदी के बिना हरियाली तीज का त्योहार अधूरा है। शादीशुदा महिलाओं के लिए मेहंदी के बिना कोई भी त्योहार अधूरा होता है। मेहंदी किसी भी लड़की और दुल्हन के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। सभी लड़कियां और महिलाएं अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं। कहते हैं अगर मेहंदी का रंग गहरा हो तो इसका मतलब है कि उसका पति उनसे बहुत प्यार करता है।

वट वृक्ष

बरगद के पेड़ में झूला लटकाया जाता है। हिंदू धर्म में सावन के झूले का बहुत ही खास महत्व है। पेड़ में झूला लगाकर विवाहित और लड़कियां झूला झूलती हैं और सावन के लोकगीत गाती हैं। हरियाली तीज पर सभी महिलाएं एक जगह एकत्रित होकर सावन के झूले का आनंद उठाती हैं और नाच-गाकर त्योहार मनाती हैं। इस दिन उन्हें अपने परिवार से मुक्ति मिलती है और कोई बंधन नहीं है।

तीज बाजार

तीज के दिन स्थानीय बाजार लगते हैं। तीज मेला लगता है। जिसमें महिलाओं के मनोरंजन के लिए बहुत कुछ होता है। यहां झूले लगे होते हैं। तरह-तरह के सामान मिलते हैं। सुहागिनें एवं युवतियां खुलकर खरीदी करती है। महिलाएं और अविवाहित लड़कियां इस दिन का बेसब्री से इंतजार करती हैं, क्योंकि इस दिन वे मन चाहे तरीके से तैयार हो सकती हैं। नये वस्त्रों, आभूषणों से स्वयं को सजाती है। मेले में फूड स्टॉल भी लगाए जाते हैं।

तीज बाजार ने आधुनिक युग के अनुसार खुद को बदल लिया है। पहले यह शहर गांव में सबके लिए हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह बदल गया है। अब यह किसी भी समूह, विशेष समाज द्वारा एक स्थान पर लगाया जाता है। यह सरकार द्वारा आयोजित नहीं है।

हरियाली तीज व्रत व पूजा विधि | Hariyali Teej Vrat and Worship Method

कुछ जगहों पर हरियाली तीज पर भी व्रत रखा जाता है। हरियाली तीज व्रत का प्रावधान हर जगह नहीं है। यह मुख्य रूप से राजस्थान और मारवाड़ी समाज द्वारा रखा जाता है। वे लोग इस दिन पूरे 24 घंटे निर्जला व्रत रखते हैं। वह पानी की एक बूंद भी नहीं लेती है और अपने पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती है। पूरे दिन उपवास करने के बाद रात को पार्वती माता की पूजा करती हैं और अगले दिन सुबह इस व्रत को तोड़ती हैं। तीज (Teej) के दिन पार्वती जी की पूजा की जाती है। जिसे तीज माता (Teej Mata) के नाम से भी जाना जाता है। श्रावणी तीज राजस्थान में बहुत लोकप्रिय है। इस दिन जगह-जगह कार्यक्रम होते हैं। हर गली नुक्कड़ में नाच गाना होता है।

सौभाग्य कामना के लिए जरूर करें ये उपाय

हरियाली तीज का व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन हरियाली तीज की थाली भेंट करनी चाहिए और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। इस थाली से कुछ चीजें मांगें और फिर उन्हें देवी पार्वती को अर्पित करें।

हरियाली तीज पर मां पार्वती को खीर का भोग लगाना चाहिए। भक्तों को इसे भोग लगाकर प्रसाद के रूप में लेना चाहिए। ऐसा करने से दांपत्य जीवन में प्यार का रस कभी कम नहीं होता है।

इस दिन पति-पत्नी मिलकर सुबह-शाम शिव की पूजा करे हैं। इसी के साथ शंकर जी को लाल फूल अर्पित करें। इस उपाय को करने से जीवन सुखमय रहता है और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

यदि दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच मनमुटाव चल रहा हो तो इस दिन दोनों को केसर दूध में मिलाकर माता पार्वती का अभिषेक करना चाहिए।

अक्षय लाभ के लिए हरियाली तीज पर किसी गरीब लड़की को भोजन कराएं। मान्यता है कि ऐसा करने से संतान सुख प्राप्त होता है।

राजस्थान में हरियाली तीज

वैसे तो हरियाली तीज राजस्थान का त्योहार है। लेकिन अब यह पूरे देश में मनाया जाता है। इस त्योहार में महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहनती हैं और सावन के गीत गाकर झूला झूलती हैं।

महाराष्ट्र में हरियाली तीज (Hariyali Teej) महत्व

इसी तरह महाराष्ट्र में महिलाएं हरी साड़ी, हरी चूड़ियां, सुनहरी बिंदी और काजल पहनती हैं। वे नारियल को सजती हैं और अपने जानने वालों के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक-दूसरे को देती हैं।

वृन्दावन में हरियाली तीज (Hariyali Teej) का महत्व

मथुरा के वृंदावन में हरियाली तीज का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन से शुरू होने वाले त्योहार कृष्ण जन्माष्टमी तक मनाए जाते हैं। एक प्राचीन कथा के अनुसार कृष्ण अपनी राधा और गोपियों सहित वृंदावन में हरियाली तीज बड़े उत्साह के साथ मनाते थे। मथुरा में यह परंपरा आज भी कायम है और जहां महिलाएं झूला झूलती हैं और सावन के गीत गाती हैं वहां झूले लगाए जाते हैं। वहां इसे झुल्लन लीला कहते हैं। बांके बिहारी मंदिर में कृष्ण के गीतों से वातावरण मनमोहक हो जाता है। मंदिर में कृष्ण और राधा की लीला भी सुनाई जाती है। कहते है कि इस दिन कृष्ण और राधा (Krishna and Radha) इस मंदिर में अपने स्थान पर आते हैं और कृष्ण राधा को झूले पर झूला झूलते हैं। वृंदावन में हरियाली तीज के दिन सोने का झूला बनाया जाता है। इसे साल में एक बार बनाया जाता है। जिसे देखने के लिए लोग बहुत दूर-दूर से आते हैं और वृंदावन (Vrindavan) में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

भगवान कृष्ण की पूजा के पश्चात यहां सभी पर पवित्र जल छिड़का जाता है। जिससे सभी को बहुत अच्छा लगता है। वृंदावन में हरियाली तीज (Hariyali Teej) के लिए खास इंतजाम किए जाते हैं। इसे देखने के लिए विदेशी खासतौर पर भारत आते हैं।

हरियाली अमावस्या व आदि अमावस्या महत्व पूजा विधि | Hariyali Amavasya and Adi Amavasya Significance Worship Method

क्यों मनाई जाती है (Hariyali Amavasya) हरियाली अमावस्या?

हरियाली अमावस्या जैसा कि नाम से पता चलता है, हरियाली का अर्थ है चारों ओर हरा वातावरण और जिस दिन चंद्रमा नहीं निकलता उस दिन अमावस्या। हरियाली तीज और हरियाली अमावस्या तीन दिन आगे-पीछे आती है। तीज की तरह अमावस्या का भी बहुत ही खास महत्व है। हरियाली अमावस्या का मुख्य उद्देश्य प्रकृति की सुंदरता और उसके स्वरूप को मनुष्य के जीवन से जोड़कर एकता की शिक्षा देना है। लोगों को प्रकृति की हरियाली के महत्व को समझाने के लिए हरियाली अमावस्या बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। इस तरह के त्योहार से मनुष्य प्रकृति के करीब आ सकता है, और उसके महत्व को समझ सकता है। हरियाली अमावस्या का एक और महत्व यह है कि यह लोगों को प्रकृति के महत्व के बारे में बताती है। इस दिन लोगों से पेड़ लगाने का आग्रह किया जाता है। इससे उन्हें सुख-समृद्धि भी मिलती है। पुराणों के अनुसार वृक्ष लगाने से दस पुत्रों के समान सुख मिलता है। वैसे अमावस्या को पितरों का दिन माना जाता है। हिंदू इस दिन पवित्र नदी में स्नान करके, दान देकर, पितरों को पिंड देकर अपने पूर्वजों, पितरों को याद करते हैं।

आदि अमावस्या 

दक्षिण भारत में स्थित तमिलनाडु (Tamil Nadu) में तमिल लोग अपने कैलेंडर मुताबिक आदि के महीने में आदि अमावसी (Adi Amavasi) मनाते हैं। इस दिन वे विशेष रूप से श्राद्ध और तर्पण करते हैं। तमिल लोग इस दिन अपने आराध्य भगवान मुरुगन की पूजा करते हैं। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य मिलता है और तीर्थधाम में पिंड दान होता है। हजारों लोग इस दिन रामेश्वरम के अग्नि तीर्थ में डूपकी लगाते हैं और पितरों का स्मरणकरते करते हैं। इसके अलावा कावेरी नदी और घाट में भी भीड़ होती है। साथ ही कन्याकुमारी के त्रिवेणी संगम में विशेष आयोजन होते हैं। आदि अमावस्या के दिन लोग व्रत रखते हैं और एक समय भोजन करते हैं। आदि मास तमिल लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए आदि अमावस्या पर विशेष पूजा, हवन का आयोजन किया जाता है। भगवान मुरुगा के विश्वासी अपने पापों को धोने के लिए पलानी के शंमुगा नदी में डुबकी लगाते हैं। यहां कुछ लोग अपने बाल भी दान करते हैं।

हरियाली अमावस्या (Hariyali Amavasya) मनाने का तरीका

हरियाली अमावस्या के दिन मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा की जाती है। किसान अच्छी बारिश, मानसून की प्रार्थना करते हैं। ताकि खेती में कोई दिक्कत न हो। सभी शिव मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। वृंदावन और मथुरा में इस दिन खूब धूम-धाम होती है। मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में दूर-दूर से हजारों कृष्ण भक्त पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में भी भक्ति का माहौल होता है। इस दिन विश्व प्रसिद्ध फूल बंगला महोत्व भी समाप्त होता है।

हरियाली अमावस्या पर पीपल के पेड़ की विशेष पूजा की जाती है। भक्त पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं और मालपुआ का भोग चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि पीपल के पेड़ में देवताओं का वास होता है। इसलिए इस दिन उन्हें दूध, दही और विशेष प्रसाद चढ़ाया जाता है। हरियाली अमावस्या का भी व्रत रखते है। ब्राह्मणों को भोजन कराकर एक समय ही भोजन ग्रहण करते है। जीवन में शांति के लिए लोग इस दिन शनिदेव की पूजा करते हैं और उन्हें तेल चढ़ाकर, दिया लगाते है। इस दिन केले के पेड़ की भी पूजा की जाती है। साथ ही कहा जाता है कि इस दिन केले का पेड़ जरूर लगाना चाहिए। चना-गुड़ दान में दिया जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन कोई एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए।

राजस्थान में अमावस्या मनाने का महत्व व तरीका

राजस्थान में हरियाली अमावस्या बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। जयपुर और उदयपुर में खास तैयारियां की जाती हैं। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को हरा-भरा रखना है। इसे बड़े पैमाने पर मनाने से ज्यादा से ज्यादा लोग इसके महत्व को समझते हैं। महाराज फतेह सिंह ने इस दिन को उदयपुर में बड़े रूप से मनाने की शुरुवात की थी। महाराजा ने एक बार देखा कि उनके राज्य में पानी की काफी बर्बादी हो रही है। इसे रोकने के लिए उन्होंने एक जलाशय का निर्माण करवाया। इस जलाशय को फतेह सागर जलाशय कहा गया। जलाशय का निर्माण सावन माह की अमावस्या के दिन संपन्न हुआ। उसके बाद एक बड़े उत्सव का आयोजन यहां किया गया। इस मेले की प्रथा आज भी जारी है।

मेला सहेलीयों की बारी से फ़तेहसागर तक का होता है। यह मेला अब तीन दिनों के लिए है। जिसमें विभिन्न प्रकार के खेल, कुश्ती प्रतियोगिता, लोक नृत्य होते हैं। इसके साथ ही कपड़े, ज्वेलरी, खाने के स्टॉल भी लगाए जाते हैं। यह मेला बहुत प्रसिद्ध है। इसे देखने के लिए देश-विदेश से कई पर्यटक उदयपुर जाते हैं। विदेशी सैलानी भी यहां मस्ती करते नजर आते हैं। ऐसे आयोजन हमारी भारतीय सभ्यता, संस्कृति को दिखाते हैं। मेले के अंतिम दिन यहां केवल महिलाओं को ही जाने की अनुमति होती है, सभी महिलाएं खुलकर मस्ती करती हैं। साथ ही अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना भी करती हैं। इसके अलावा इस मेले में वृक्षारोपण का कार्यक्रम भी रखा जाता है।

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