Kabir Das Jayanti 2022: कब है कबीर दास जयंती, जानिए उनके जीवन से जुड़ी तिथि व तथ्य

Kabir Jayanti 2022 | Kabir Das Jayanti 2022 | Kabir Ds Birthday: माना जाता है कि संवत 1455 की इस पूर्णिमा को कबीरदास का जन्म हुआ था। संत कबीर दास भक्ति काल के ऐसे कवि थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में फैली बुराइयों को दूर करने में लगा दिया। हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को संत कबीरदास की जयंती (Kabir Jayanti) के रूप में मनाया जाता है। इस बार संत कबीरदास की जयंती 14 जून 2021 को मनाई जाएगी। उनके जन्म के बारे में सही-सही कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन पुराने प्रमाणों के अनुसार कबीरदास जी का जन्म 1398 ईस्वी में काशी में हुआ था और उनकी मृत्यु 1518 ईस्वी में मगहर नामक स्थान पर हुई थी। . उन्होंने अपने दोहों में धार्मिक पाखंड का कड़ा विरोध किया। कबीर जी के जन्म के समय समाज में हर जगह कुरीतियां और पाखंड फैल गया था। संत कबीर ने अपना पूरा जीवन समाज से पाखंड, अंधविश्वास को दूर करने में लगा दिया। संत कबीर के दोहे मनुष्य को अंधकार से निकाल कर सही राह दिखाते हैं। उनके दोहे बहुत ही सरल भाषा में थे। जिससे जनता उन दोहे को आसानी से समझ सके। आज भी लोग उनके दोहे गुनगुनाते हैं। तो आइए जानते हैं कबीर दास जी की जयंती (Kabir Jayanti) के पावन मोके पर कबीर दास जी के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।

कबीर दास जी के जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कहा जाता है कि रामानंद गुरु के आशीर्वाद से उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि जनता की शर्म के डर से, उन्होंने उन्हें काशी के समक्ष लहरतारा नामक झील के पास छोड़ दिया। जिसके बाद उस रास्ते से गुजर रहे लेई और लोइमा नाम के जुलाहे ने उन्हें पाला। तो वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और उन्हें राम नाम का ज्ञान गुरु रामानंद से मिला था।

कबीर जी के बारे में कहा जाता है कि वे निरक्षर थे। उनके द्वारा रचित सभी दोहे उनके मुख से ही बोले गए हैं। उन्होंने अपनी अमृत वाणी से लोगों के मन में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया और धर्म के कट्टरपंथ पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने समाज को सुधारने के लिए कई दोहे कहे, जिससे उन्हें समाज सुधारक कहा गया। संत कबीर के नाम पर कबीर पंथ नामक एक समुदाय की स्थापना की गई। आज भी इस पंथ के लाखों अनुयायी हैं।

उस समय समाज में यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने वाले को स्वर्ग मिलता है, जबकि मगहर में नर्क में भोगना पड़ता है। लोगों में फैले इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कबीर जी जीवन भर काशी में रहे, लेकिन अंत में वे मगहर चले गए और मगहर में ही कबीर दास जी की मृत्यु हो गई। कबीर जी को मानने वाले लोग हर धर्म के थे, इसलिए जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम दोनों में विवाद हो गया। जब शव से चादर उठाई गई तो सिर्फ फूल थे। लोगों ने इन फूलों को आपस में बांट लिया और अपने अनुसार अंतिम संस्कार किया।

कबीरदास जी ने समाज में स्वर्ग और नर्क को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को तोड़ने के लिए एक महान उदाहरण पेश किया। काशी में अपना पूरा जीवन बिताने वाले संत कबीर दास ने अपने अंतिम समय के लिए एक जगह चुनी, जो उन दिनों एक अंधविश्वास था कि वहां मरने से नरक मिलता है।

कबीरदास जयंती (Kabir Jayanti) इस साल 14 जून को मनाई जाएगी। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन कबीर दास का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन उनकी जयंती (Kabir Jayanti) मनाई जाती है। कबीर दास भक्ति काल के प्रमुख कवि थे, वे ज्ञानश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की बुराइयों को दूर करने में लगा दिया। उनकी रचनाओं को आज भी दोहे के रूप में गाया जाता है। कबीर दास जी का जन्म 1398 में काशी में हुआ था, जबकि उनकी मृत्यु 1518 में मगहर में हुई थी।

संत कबीर ने जीवन भर पाखंड, अंधविश्वास और व्यक्ति पूजा का विरोध करते हुए अपने अमृतवााणी से लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया। कबीर की वाणी आज भी अमृत के समान है, जो मनुष्य को नया जीवन देने का काम कर रही है। संत कबीर के लोकप्रिय दोहे हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का काम करते हैं।

कबीरदास जी ने जीवन भर लोगों के बीच प्रेम, सद्भाव और एकता पैदा करने का प्रयास किया। उन्होंने न केवल अपनी अमृत वाणी से बल्कि आप एक उदाहरण पेश करके लोगों का भ्रम तोड़ने की कोशिश की। उनके नाम पर कबीर पंथ की भी स्थापना हुई। धर्मदास ने उनकी वाणियों का संग्रह “बीजक” नामक ग्रंथ में किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं – सखी, सबद (पद), रमैनी।

कबीरदास जी ने समाज में स्वर्ग और नर्क को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को तोड़ने के लिए एक महान उदाहरण पेश किया। काशी में अपना पूरा जीवन बिताने वाले संत कबीर दास ने अपने अंतिम समय के लिए एक जगह चुनी, जो उन दिनों एक अंधविश्वास था कि वहां मरने से नरक मिलता है। कबीर दास जी अपने अंतिम समय में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के निकट मगहर में लोगों के इस भ्रम को तोड़ने के लिए गए थे और उन्होंने अपना शरीर वहीं छोड़ दिया।

जब मगहर में कबीरदास जी की मृत्यु हुई, तो उनके शव के अंतिम संस्कार को लेकर उनके हिंदू और मुस्लिम भक्तों के बीच विवाद हो गया। कहा जाता है कि उस समय जब उनके शव से चादर हटाई गई तो लोगों को वहां केवल फूलों का ढेर मिला। जिसके बाद हिंदुओं ने अपने रीति-रिवाजों के अनुसार और मुसलमानों ने अपनी परंपरा के अनुसार आधे फूल से अंतिम संस्कार किया।

कबीर के जन्म के संबंध में हैं दो मत

कुछ लोग उन्हें हिंदू मानते हैं तो कुछ का कहना है कि उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके जन्म के बारे में यह भी वर्णन मिलता है कि उनका जन्म काशी के एक ब्राह्मणी के गर्भ से रामानंद स्वामी के आशीर्वाद से हुआ था, जो एक विधवा थी । रामानंद स्वामी ने गलती से कबीरदास जी की माता को आशीर्वाद दे दिया था। वहीं एक अन्य मत के अनुसार यह भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और बाद में उन्होंने अपने गुरु रामानंद से हिंदू धर्म का ज्ञान प्राप्त किया। कबीरदास जी देशाटन करते थे और हमेशा साधु और संतों की संगति में रहते थे।

निर्गुण ब्रह्म को मानने वाले कबीर थे

कबीर दास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। वे केवल एक ईश्वर में विश्वास करते थे। वे अंध विश्वास, धर्म और पूजा के नाम पर दिखावे के विरोधी थे। उन्होंने ब्रह्म के लिए राम, हरि आदि शब्दों का प्रयोग किया है। उनके अनुसार ब्रह्म को अन्य नामों से भी जाना जाता है। उन्होंने समाज को ज्ञान का मार्ग दिखाया। जिसमें गुरु का महत्व सर्वोपरि है। कबीर एक स्वतंत्र विचारक थे। उन्होंने लोगों को समझाने के लिए अपनी रचनाओं सबद, सखी और रमैनी में सरल और लोक भाषा का प्रयोग किया है।

मगहर में ली अंतिम सांस

कबीरदास ने अपना पूरा जीवन काशी में बिताया। लेकिन अपने जीवन के अंत में वे काशी छोड़कर मगहर चले गए। कहा जाता है कि 1518 के आसपास मगहर में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके दोहे आज भी लोगों के मुंह से सुने जाते हैं।

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